About Swami Ji Maharaj


About Swami Ji

2003 में पुणे स्थित सिम्बोइसिस कॉलेज के वार्षिक कॉन्वोकेशन में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष श्री मनोहर जोशी जी, श्री टी एन शेषन जी

अनंत श्री विभूषित श्रीमद जगद्गुरु अभिनव शंकर स्वामी अमृतानंद देव तीर्थ का अवतरण उत्तर प्रदेश की पावन धरा पर देवरिया जनपद के देवघाट में सुविख्यात ‘सरवरिया दुबे वंश’ में संवत् 2025 भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हुआ । अपनी गौरवशाली वंश परंपरा के अनुरूप युवावस्था में ही प्रवृत्ति मार्ग से निवृत्ति मार्ग पर चलते हुए वर्ष 1994 में काशी में पुरी के पूर्व शंकराचार्य जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ जी के साहचर्य व उपदेश से प्रभावित होकर विश्व कल्याण की भावना से 108 नक्षत्र वाटिका एवं असाध्य रोग चिकित्सा शिविरों का संकल्प लिया।

इसी क्रम में 2002 में पुणे महाराष्ट्र में चतुर्मास की अवधि में काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष श्रद्धा डॉ रामयत्न शुक्ल जी के साथ काशी विद्वत परिषद के अन्य पदाधिकारी पुणे में स्वामी जी से मिलने आए और सनातन धर्म के उत्स कश्मीर की शारदा सर्वज्ञ पीठ पाक अधिकृत कश्मीर के पुनरुद्धार हेतु विद्वत जनों की चिंता से अवगत कराया । तथा भारत सरकार के 22 फरवरी 1994 के सर्वसम्मति से पास किए गए संसदीय प्रस्ताव के बारे में बताया। चर्चा के दौरान यह स्पष्ट किया कि विश्व में जगतगुरु उपाधि प्रदान करने वाले सर्वज्ञ पीठम् का उद्धार भारत को विश्व गुरु के रूप में उद्भाषित करने हेतु आवश्यक है। भारत सरकार 22 फरवरी 1994 के अपने संसदीय प्रस्ताव को क्रियान्वित करने में अब तक असफल रही है, अतः ऐसे समय में विद्वानों का यह दायित्व बनता है कि उस पीठ पर धार्मिक नेतृत्व स्थापित कर इस राष्ट्रीय व धार्मिक संवेदनशील विषय का समाधान किया जाए। किंतु कश्मीर में धार्मिक अनुवाद के कारण उत्पन्न आतंकवाद के कारण वहां कोई सक्षम धर्माचार्य जाने को तैयार नहीं हो रहा है और किसी वृद्ध धर्माचार्य को वहां भेजना उचित नहीं होगा, अतः आप राष्ट्र और धर्म हित में यह दायित्व स्वीकार करें।
काशी विद्वत परिषद के इस प्रस्ताव को गंभीरता से लेकर स्वामी जी ने अपने अनुयायियों की एक सभा पुणे के विख्यात सिंबोसिस कॉलेज के सभागार में एक सभा आहूत की। जिसमें काशी विद्युत परिषद के अध्यक्ष डॉ रामयत्न शुक्ल जी व उपाध्यक्ष डॉक्टर शिव जी उपाध्याय सहित अन्य पदाधिकारियों व पुणे के गणमान्य नागरिकों ने सहभागिता की। इस सभा में वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को काशी में श्री शारदा सर्वज्ञ पीठाधीश्वर श्रीमद् जगद्गुरु शंकराचार्य के रूप में स्वामी जी को प्रतिष्ठित करने का निर्णय लिया । फिर स्वामी जी ने विषय की गंभीरता को देखते हुए सबके निवेदन को स्वीकार करते हुए अपनी स्वीकृति प्रदान की। इस प्रकार 16 मई 2003 को काशी के नगर निगम प्रेक्षागृह सिगरा में वाराणसी में काशी विद्वत परिषद्, काशी दंडी संन्यासी सेवा समिति, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर अभिराज राजेंद्र मिश्र जी व देश की मूर्धन्य विद्वानों, धर्म परायण नागरिकों की उपस्थिति में वैदिक विधि विधान से अनंत श्री विभूषित स्वामी अमृतानंद देव तीर्थ महाभाग को उपनिषदीय निष्कलाम्नाय सहस्त्रार्क द्युति मठ श्री शारदा सर्वज्ञ पीठम् कश्मीर के 500 वर्ष के उपरांत प्रथम पीठाधीश्वर श्रीमद जगद्गुरु अभिनव शंकर के रूप में प्रतिष्ठित किया गया और कालक्रम से विलुप्त सर्वज्ञ पीठ की सनातन धर्म की परंपरा को शोधित करते हुए इस अनादि पीठ के उद्धार व संचालन करने का दायित्व सौंपा गया।
तब से आज तक स्वामी जी अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए श्री शारदा सर्वज्ञ पीठम् कश्मीर के गौरवशाली सनातन धर्म परंपरा को संचालित करते हुए इसे पाकिस्तान से मुक्त कराने के लिए संकल्पित हैं ।और इसी वैश्विक उदारता व ज्ञान के प्रचार-प्रसार की भावना से श्रीमद् जगद्गुरु शारदा सर्वज्ञ पीठम् न्यास की स्थापना की।