नक्षत्र-वृक्ष विज्ञान


नक्षत्र-वृक्ष विज्ञान

ज्योतिष में नक्षत्र का महत्व
जब भी किसी बालक का जन्म होता है तो सर्व प्रथम उसके जन्म नक्षत्र को ही देखा जाता है. जन्म नक्षत्र के अनुसार ही उसका नामकरण करने की वैदिक प्रथा है. चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, वही जन्म का नक्षत्र होता है. चंद्रमा द्वारा नक्षत्र के शेष भोगांश के आधार पर ही जातक जीवन में उस नक्षत्र के ग्रह की दशा को भोगना प्रारम्भ करता है. फलित ज्योतिष का आधार ही चंद्रमा का नक्षत्र पर गोचर है. भगवान कृष्ण ने भी गीता में कहा कि नक्षत्रों में चंद्रमा हूँ. नक्षत्रों की संख्या सत्ताईस है, जिस पर चंद्रमा गोचर करता हुआ अपना चक्कर लगाता है.
चंद्रमा का नक्षत्रों का एक चक्कर लगाने पर एक चन्द्र महिना बनता है. हिन्दू कैलेंडर में जो महीनों के नाम है वे नक्षत्रों के नाम पर ही है. प्रत्येक पूर्णिमा तिथि को चंदमा जिस नक्षत्र पर होता है, उसी नक्षत्र के नाम के आधार पर ही बीते हुए महिने का नाम रखा गया है.
नक्षत्र और चंदमा ही ज्योतिष का मुख्य आधार है. चंद्रमा हमारे मन का कारक है. पहले रोग मन में दूषित विचार के रूप में आता है, फिर वह नकारात्मक विचार अथवा हिंसा युक्त भावना मन से प्राण शरीर में विकार उत्पन्न करके शरीर व उसके अंगों रोग ग्रस्त करती है. हिंसा युक्त मन की सूक्ष्म तरंगे आंतरिक चित्त के आकाश तत्व को दूषित करती है, आकाश तत्व में गड़बड़ी होने से नक्षत्र व ग्रहों के बुरे फल मिलने से शुरू हो जाते है. जीवन में हानि, अपमान, पराजय, रोग आदि कष्ट होने से प्रारंभ हो जाते हैं. इससे बचने का एक मात्र उपाय है -भगवान की शरण और नक्षत्र और उनके देवता की उपासना. विशेष रूप से जातक जन्म के समय जिस नक्षत्र का बल प्राप्त करता है, उसी नक्षत्र के वृक्ष और उसके देवता की उपासना से उसे शीघ्र लाभ मिलने लगता है.

यह वैदिक विज्ञान बहुत प्राचीन काल से हमारे ऋषि मुनियों व ज्योतिषी साधकों द्वारा परम्परा से सुरक्षित रहा है. मन्त्र जाप, यज्ञ-अनुष्ठान से अनेक असाध्य रोगों व कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है. कोई भी मन्त्र निष्फल नहीं होता, कोई भी औषधि व्यर्थ नहीं है, कोई भी वृक्ष अनुपयोगी नहीं है. इस पुस्तक में नक्षत्र के वृक्षों के साथ उनके मन्त्र भी दिए गए हैं. किन्तु योग्य विद्वान से ही नक्षत्र वृक्ष की उपासना और मन्त्र जाप की दीक्षा लें तो अवश्य लाभ ही लाभ होगा.
-आचार्य मदन,
भारतीय आयुर्वेद व खगोल विद्या के मेल से नक्षत्र ज्योतिष उपचार का प्रादुर्भाव हुआ. आज भारत ही नहीं विश्व स्तर पर नक्षत्र आधारित ज्योतिषीय उपचार की आवश्यकता है. प्रत्येक वानस्पतिक औषधि व वृक्ष आकाश के 27 नक्षत्रों के प्रभाव से उत्पन्न होता है. किसी नक्षत्र विशेष में उत्पन्न हुए रोग की चिकित्सा भी उसी नक्षत्र के प्रतिनिधि औषधि व वृक्ष के बीजारोपण, धारण व उपासना से करने का विज्ञान वैदिक परम्परा में मिलता है.
नक्षत्रों के साथ खगोल की बारह राशि मण्डल व नवग्रहों के भी अपने-अपने वृक्ष है, जो ज्योतिषीय उपाय में प्रयुक्त होते हैं. किन्तु ग्रहशांति के यज्ञीय कार्यों में सही जानकारी के अभाव में अधिकतर लोगों को सही वनस्पति और नक्षत्र वृक्ष नहीं मिल पाता है, इसलिए नगर-नगर, ग्राम-ग्राम नवग्रह व नक्षत्र वृक्षों की वाटिका को स्थापित करने की महती आवश्यकता है.