नक्षत्र वृक्षों का परिचय


नक्षत्र वृक्षों का परिचय

वृक्षों का संक्षिप्त परिचय
नक्षत्रों के वृक्षों का संक्षिप्त परिचय निम्रानुसार है:-

1. कुचिला – मध्यम ऊँचाई का वृक्ष जो मध्य भारत के वनों में पाया जाता है। इसके टिकियानुमा बीजों में स्थित विष बहुत अधिक औषधीय महत्त्व का होता है।

2. आंवला – इसके फल को अमृत फल कहा गया है जो विटामिन ‘सी’ का समृद्ध स्त्रोत है।

 3. गूलर – बड़े आकार का छायादार वृक्ष। शुक्र ग्रह की शान्ति में इसकी समिधा प्रयुक्त होती है।

 4. जामुन – बहते जल क्षेत्रों के नजदीक आसानी से उगने वाला वृक्ष। मधुमेह की श्रेष्ठतम औषधि।

5. खैर – मध्यम ऊँचाई का कांटेदार वृक्ष। इसकी लकड़ी से कत्था बनता है।

6. काला तेंदू/शीशम – आद्र्रा नक्षत्र हेतु वर्णित नक्षत्र वृक्ष शब्द ‘कृष्ण’ के अर्थ में दोनों वृक्ष आ जाते हैं। शीशम – ऊँचे वृक्ष वाली महत्त्वपूर्ण काष्ठ प्रजाति। काला तेंदू – काले तने वाला वृक्ष जिसका प्रकाष्ठ अत्यन्त मजूबत व काला होता है। फल खाने के काम में आता है व पत्तियाँ बीड़ी बनाने के काम आती हैं।

7. बांस – इसे गरीब की ‘इमारती लकड़ी’ कहते हैं।

8. पीपल – अति पवित्र वृक्ष। भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ‘बोधि’ प्राप्त हुई थी।

9. नागकेसर – मुख्य रूप से आसाम के आद्र्र क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला वृक्ष। इसकी लकड़ी अत्यधिक कठोर होती है।

10. बरगद – वट सावित्री व्रत में हिन्दू महिलाओं द्वारा पूजा जाने वाला विशालकाय छायादार वृक्ष।

11. पलाश – सूखे व बंजर क्षेत्रों में उगने वाला मध्यम ऊँचाई का वृक्ष। फूल से होली पर खेलने वाले रंग बनाते हैं। इसे ‘वन ज्वाला’ (फ्लेम आफ द फारेस्ट) भी कहते हैं।

12. पाकड़ – घनी शीतल छाया देने के लिए प्रसिद्ध वृक्ष।

13. रीठा – मध्यम ऊँचाई का वृक्ष जिसका फल झाग देने के कारण धुलाई के कार्यों में प्रयुक्त होता है।

14. बेल – कठोर कवच के फल वाला मध्यम ऊँचाई का वृक्ष जिसकी पत्तियां शिवजी की पूजा में चढ़ाई जाती हैं।

15. अर्जुन – जलमग्र या ऊँचे जलस्तर वाले क्षेत्रों में आसानी से उगने वाला वृक्ष है। इसकी छाल हृदय रोग की श्रेष्ठतम औषधि है।

16. कंटारी – छोटी ऊँचाई के इस वृक्ष के कांटे बहुशाखित होते हैं, इसके फल त्रिदोषनाशक होते हैं।

17. मौलश्री – दक्षिण भारत में प्राकृतिक रूप से उगने वाला छायादार- शोभाकार वृक्ष।

18. चीड़ – ठन्डे पहाड़ी क्षेत्र में उगने वाली सुई जैसी पत्तियों वाला सीधी ऊँ चाई में बढऩे वाला वृक्ष जिसकी छाल पतली होती है।

19. साल – प्रदेश के तराई क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से उगने अति महत्त्वपूर्ण प्रकाष्ठ वृक्ष।

20. अशोक- बहते जल स्त्रोतों के किनारे उगने वाला छोटी ऊँचाई का वृक्ष।

21. कटहल – मध्यम ऊँचाई का वृक्ष जिसके बृहदाकार फल की सब्जी खाई जाती है।

22. आक – बंजर शुष्क भूमि पर उगने वाली झाड़ी जैसी प्रजाति।

23. शमी – छोटे कांटों वाला छोटी ऊँचाई का वृक्ष जिसे उ.प्र. में छयोंकर व राजस्थान में खेजड़ी कहते हैं।

24. कदम्ब – भगवान कृष्ण की स्मृति से जुड़ा ऊँचा वृक्ष जो आद्र्र क्षेत्रों में आसानी से उगता है।

25. आम – भारत में फलों का राजा नाम से प्रख्यात है।

26. नीम – ‘गाँव के वैद्य’ नाम से प्रसिद्ध औषधीय महत्त्व का वृक्ष।

27. महुआ – शुष्क पथरीली व रेतीली व रेतीली भूमि में उगने वाला वृक्ष। गरीबों में उपयोगिता के कारण इसे ‘गरीब का भोजन’ नाम की उपमा दी जाती है।.

इन वृक्षों का रोपण एक वृत्त के रूप में वृत्त की परिधि को 27 बराबर भागों में बांट कर निम्र प्रकार किया जा सकता है
वृक्षों में प्राण तत्व होने से उनमें एक दैवीय चेतना होती है, जो इस पार्थिव चेतन युक्त हमारे प्राण शरीर और सूक्ष्म मन अंतःकरण को अपने प्रभाव में लेने में सक्षम होती है. कुछ स्थूल रूप से भी मानव देह और वृक्ष के तत्व गुण का विवेचन उपनिषदों में किया गया है. बृहदारण्यक उपनिषद् (अध्याय ३ ब्राह्मण ९) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शरीर और वृक्ष की समानता का रहस्य प्रतिपादित करते हुए कहा कि -‘वृक्ष के पत्ते होते हैं, शरीर में रोम. वृक्ष की छाल होती है, शरीर में त्वचा. वृक्ष में गोंद निकलता है, शरीर में रक्त’
छांदोग्य-उपनिषद् (अध्याय ६ खंड ११) में तत्त्व की व्याख्या करते हुए आरुणि ने वृक्ष को जीव-आत्मा से ओतप्रोत बतलाया है-‘यदि कोई वृक्ष के मूल में आघात करे तो यह जीवित रहते हुए केवल रस स्राव करेगा, यदि इसके अग्रभाग में आघात करे तो भी यह रस स्राव करेगा, किंतु यदि वृक्ष को जीव छोड़ देता है तो वह भी सूख जाता है, ठीक उसी प्रकार जैसे जीव से रहित होने पर शरीर मर जाता है।’
भारतीय लोकमानस ने वृक्ष-वनस्पति और मनुष्य में चेतना के स्तर पर कोई भेद नहीं माना ।
वायु पुराण अध्याय 172-40 में कहा गया है- जिस प्रकार सुपुत्र अपने कुल का उद्धार कर देता है, तथा प्रयत्नपूर्वक नियम से किया गया अति कृच्छ्र व्रत उद्धारक होता है, वैसे ही फलों व फूलों से संपन्न वृक्ष अपने स्वामी का नरक से उद्धार कर देते हैं ।
इसके आगे अध्याय 173-8 में गया है – द्रुमेभ्य: साधनं यतः धर्मार्थकाममोक्षणाम्
-वृक्षों के रोपण करने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सिद्ध होते हैं, पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्ध करने के लिए वृक्ष ही सरल साधन है ।
धन की देवी लक्ष्मी जी का बिल्व वृक्ष से सम्बन्ध –
ऋग्वेदोक्त श्रीसूक्त में -वनस्पतिस्तव वृक्षोsथ बिल्वः- लक्ष्मी से ही बिल्व की उत्पत्ति बताई गई है –
वामन पुराण में,बिल्वो लक्ष्म्याः करेsभवत् -बिल्व में लक्ष्मी का निवास कहा गया है ।
भविष्य पुराण में कहा गया है कि देवासुर संग्राम में लक्ष्मी ने कुछ देर के लिए बिल्व के वृक्ष पर आश्रय लिया था । इसी कारण बिल्व को श्रीवृक्ष भी कहा गया है और उसकी पूजा के लिए यह मन्त्र दिया गया है – श्रीनिवास नमस्तेऽस्तु श्रीवृक्ष शिववल्लभ । ममाभिलषितं कृत्वा सर्वविघ्नहरो भव । (60-6)

इसी प्रकार ,पीपल का पेड़ लगाने का महत्व –
योऽश्वथं पीपल रोपयेद् विधिना नरः गच्छेत्स भवनं हरे:
– अर्थात् जो कोई व्यक्ति विधिपूर्वक पीपल का पेड़ लगाता है, वह ऐश्वर्य को भोगता हुआ, परलोक गमन पर श्रीहरि भगवान् विष्णु की सन्निधि प्राप्त कर लेता है ।
वट के वृक्ष लगाने का लाभ –
वटवृक्षद्वयं मर्त्त्यो रोपयेद्यो यथाविधि: शिवलोके गमेत्सो – अर्थात् जो मनुष्य दो वट वृक्षों को यथा विधि लगाता है, वह स्त्री सुख भोग कर शिवलोक में निवास करता है ।
नीम के वृक्ष लगाने का लाभ –
निम्ब त्रयं समारोप्य नरो धर्म्मविचक्षणः सूर्यलोकं समासाद्य वसेदब्दायुत त्रयम् – अर्थात् जो धार्मिक और विचक्षण मनुष्य नीम के तीन वृक्ष का रोपण करता है, वह यश व निरोगी काया को भोगता हुआ सूर्य लोक को प्राप्त होता है ।
पाकड़ के पेड़ लगाने का लाभ
चतुर्णां प्लक्षवृक्षाणाम् रोपणात्नात्र संशय: राजसूयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्त्नोति मानवः
-जो पाकड़ के चार वृक्षों को लगाता है, वह मनुष्य राजसूय यज्ञ के फल- पुण्य को प्राप्त करता है ।
आम के वृक्ष लगाने के लाभ
पंचाम्रशाखिणाम् यः कुर्यात् प्रतिरोपणम् गारुडं लोकमा साद्य मोदते देववत्सदा
-अर्थात् जो कोई पांच आम्र के वृक्षों को लगाता है, वह देवताओं के सानिध्य को प्राप्त कर मनोवांछित फलों को प्राप्त करता है और गरुड़ लोक को प्राप्त करता है ।
पलाश के वृक्ष लगाने का लाभ
पलाशशाखिनः सप्त रोपयेदेकमेव वा ब्रह्मलोकमवाप्नोति मोदते चामरै: सह
– जो पलाश या केसूला के सात पेड़ों को रोपता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है और वहां देवताओं के साथ प्रसन्नता पाता है ।
यदि किस मनुष्य को जीवन में दारिद्र्य दुःख और क्लेशो आदि नरक से मुक्ति चाहिए तो उसके लिए भविष्यपुराण के उत्तरपर्व में 128-11 में कहा गया है
अश्वत्थमेकं पिचुमंदमेकं न्यग्रोधमेकं दश चिन्चिनीकं कपित्थ-बिल्वा-मलकी त्रयंच पंचाम्ररोपी नरकं न पश्येत्
-एक अश्वत्थ, एक नीम, एक न्यग्रोध या बरगद, दस चिन्चिनीक या इमली के पेड़ लगाने से और कैथ, बिल्व व आंवला के तीन-तीन तथा पांच पेड़ आम के लगाने से मनुष्य कभी भी नरक का मुंह नहीं देखता है ।
ऐसे ही शास्त्र अनुसार वृक्षों को घर के चारों विधिवत् लगाने से घर के वास्तु दोष के निवारण के साथ शुभ फलों में वृद्धि होती है ।
जो भी व्यक्ति अपने जन्म नक्षत्र के वृक्ष का रोपण करता है, निःसंदेह नक्षत्र व उसके देवता उसके कष्टों का हरण कर लेते हैं, यदि किसी स्थान पर 27 नक्षत्रों के अराध्य वृक्ष उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, तो उसके विकल्प में भी आराध्य वृक्ष होते हैं, साथ ही जन्म नक्षत्र जिसे हम जन्म तारा भी कहते हैं, उस जन्म तारा से चौथे नक्षत्र को क्षेमकर नक्षत्र कहा जाता है ।
सत्ताईस नक्षत्रों के तीन वर्ग होने से प्रत्येक जातक के तीन क्षेमकर नक्षत्र होते हैं, उन नक्षत्र के भी वृक्ष अनेक प्रकार से शुभ फलों में वृद्धि करते हैं । साथ ही हर एक नक्षत्र की एक धार्यौषधि भी होती है ।